Thursday, September 2, 2010

कर्म भोग

कर्म भोग
कर्मभोग समझने के लिए पहले कर्म को समझना होगा. 
कर्म क्या है ?
कर्म वो कार्य है जिसका फल होता है.  किसी भी काम का होना या करना कार्य होता है, मगर हरेक कार्य कर्म नहीं होता जैसे कि घोड़ा गाड़ी चलाता है मगर वो कर्म नही कार्य है और मनुष्य घोड़े से गाड़ी चलवाता  है ये कर्म है.  क्योंकि मनुष्य की कर्म योनी है और जो भी कार्य वो  करता या करवाता है उसका उसे फल मिलता है जैसे कि घोड़े को चाबुक मारना एक बुरा कर्म है और घोड़े कि देख भाल करना और उससे उसकी हिम्मत  के अनुसार कार्य करवाना एक अच्छा कर्म है.  क्योंकि मानव योनी एक कर्म योनी है और जानवर कि योनी एक भोग योनी है इसलिए मानव को कार्य का अच्छा या बुरा फल मिलता है और वो कार्य कर्म कहलाता है जबकि जानवर कि भोग योनी है और वो जो भी कार्य करता है वो उसके पूर्व जन्म के कर्मो  का फल है और उसका कोई फल नही होता जैसे कि शेर को हिंसा का कोई बुरा फल नही मिलता.  इसलिए जिस कार्य का फल होता है वो कर्म होता है.   इसको ज्यादा समझने के लिए आइये हम योनी के भेद को समझने का प्रयत्न करते है. 

कर्म योनी -भोग योनी  और कर्म भोग    

              कर्म योनी केवल  मानव  कि है तथा अन्य सभी योनिया भोग योनी है चाहे वो देवता हो, गन्धर्व हो, भूत हो, जानवर हो या पेढ़ पौधे हो ये सभी भोग योनी है जो कि कर्म योनी में किये गये अच्छे या बुरे कर्मो के अनुसार मिलती है.  जबकि कर्म योनी जीव को अपने अच्छे या बुरे कर्म भोग लेने के बाद नये कर्म करने के लिए मिलती है.  मानव शरीर में एक ही समय में तीन सत्ता काम करती है, एक तो जड़ शरीर, दूसरी जीवात्मा जो कि अंश तो परमात्मा का है मगर परमात्मा कि शक्ति माया के कारण मल से लिपटा होता है तथा इस शरीर का भोग करता है और उसके फल के लिए जिमेदार होता है,  तीसरी आत्मा इस शरीर में होती है जोकि जीव आत्मा के सभी कर्म चुपचाप देखती रहती है तथा  उसका लेखा जोखा  तैयार करती है और वो शरीर का भोग नही करती.  जानवर आदि भोग योनी में शरीर में सिर्फ जीव आत्मा होती है तथा आत्मा नही होती कयोंकि भोग योनी में जीव का कार्य सिर्फ अपने कर्मो का भोग होता है और वो कोई नए कर्म नही कर सकता तथा जब उसके भोग खत्म हो जाते है तो वो वापिस कर्म योनी में आ जाते है.  इसीलिए भोग योनी में जीव के कार्य बड़े सिमित होते है जैसे कि शेर सिर्फ मॉस खा सकता है और हिरन सिर्फ घास फल इत्यादि खा सकता है जबकि मानव को पूरी आज़ादी है वो कुछ भी खा सकता है.  इसी तरह देवता सिर्फ स्वर्ग के आंनंद ले सकते है पर नया कर्म नही कर सकते.  देवताओ के पद तो वोही रहते है पर उनपर विराजमान रहने वाली आत्माऐ बदलती रहती है और अपने अच्छे कर्म समाप्त होने के बाद आत्माओ को वापिस मनुष्य योनी में आना पड़ता है.  इसीलिए ज्ञानी लोग स्वर्ग का भोग नही परमात्मा से मोक्ष मांगते है.   अक्सर यह सुनने में आता है कि जब कोई मनुष्य अधिक तपस्या करता है तो देवराज इंद्र का सिंहासन इसीलिए डोलने लगता है.   ऐसा नही है कि जीव अपने सारे कर्म भोगने के बाद ही मनुष्य योनी में आता है.  बल्कि जब उसके अच्छे और बुरे कर्मो का अनुपात इस काबिल हो जाता है कि उसे मनुष्य योनी मिले तब वो मनुष्य योनी में आ  जाता है तथा जितना कठिन उसका मनुष्य योनी में आना है उतनी ही मुश्किल से उसे मनुष्य योनी से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है.  परमात्मा उसे पूरा मौका देते है कि वो मनुष्य योनी में रहकर ही अपने बुरे कर्मो का भुगतान करे और आगे के लिए शुभ कर्म करके मोक्ष पाए.  इसीलिए कई बार मनुष्य को जानवर से भी बदतर हालात में देखा जाता है.   मगर जब उसके पाप कर्म अपनी हद पार कर लेते है तब उसे भोग कि नीच वाली योनी  में भेज दिया जाता है.   इसी तरह जब कोई भोग विलास कि कामना लेकर अत्यधिक पुण्य कर्म करता है तो उसे ऊँचे स्तर कि भोग योनी जैसे देव योनी इत्यादि  मिलती है. 

कर्म योनी में मानव के जीवन को कर्म तीन प्रकार से प्रभावित करते है.  पहले है क्रियमण कर्म जोकि मानव ने कुछ समय पहले ही किये है, दुसरे है संचित कर्म जो कि मानव के खाते में जमा हो जाते है और समय आने पर फल देते है तीसरे है प्ररार्ब्ध  जो कि संचित फलो में से फल देने के लिए सक्रिय होकर उसके लिए प्रतिकूल या अनुकूल हालात पैदा करते  है.  कभी कभी क्रियमण कर्म तुरंत फल दे देते है और कभी संचित कर्मो में जुड़ जाते है.  कर्मो के फल सिर्फ प्रतिकूल या अनुकूल प्रस्थिति पैदा होने के रूप में होती है उसमे मनुष्य किस तरह बर्ताव करता है वह उसके लिए स्वतंत्र है.  ज्ञानी मनुष्य हर प्रस्थिति में एक सा रहता है और अज्ञानी सुख में अहंकार से और दुःख में विषाद से भर जाते है.  ज्ञानी मनुष्य प्रतिकूल सिथ्ति को अपने संचित बुरे कर्मो का फल समझ कर निश्चय करता है कि वो भविष्य में कभी बुरा कर्म नही करेगा जबकि अज्ञानी मनुष्य अपनी हालत के लिए दूसरो को दोषी ठहराता है.  इसी तरह कई बार हम देखते है कि बुरे कर्म करने वाला ऐश करता है मगर असल में वो अपने संचित सभी  पुण्य कर्म खत्म करके अपने पतन कि और जा रहा होता है ठीक उसी तरह जैसे कि दिया बुझने से पहले एक बार तेजी से जल उठता है.   इसी तरह कई बार पुण्य कर्म करने वाले दुःख पाते देखे जाते है उसकी वजह भी यह होती है कि वो अपने पूर्व में किये गये पाप कर्म जलाकर मोक्ष   कि तरफ जा रहे है.     

अब हम अगर मानव शरीर के कार्य करने कि प्रणाली देखे तो सर्वप्रथम आती है पांच ज्ञानेन्द्रिया - जो कि हमें वस्तु के बारे में ज्ञान करवाती है जैसे आँख, कान, नाक, त्वचा तथा जीभ.  यह पांचो ज्ञानेन्द्रिया जो सूचना होती है उसे मन तक पहुंचा देती है इन सूचनाओ के आधार पर मन पांच कर्मेन्द्रियो को कर्म करने का आदेश देता है/  ये कर्मेन्द्रिया है हाथ, पैर, वाणी, मल- मूत्र इंद्रिया तथा जननेंद्रिया.  मन अपने निर्देश देने के लिए अहंकार या बुद्धि का सहारा ले सकता है.  ज्ञानेन्द्रिया सदा मानव को अपने को अच्छा लगने वाला कार्य करने को प्रेरित करती है जैसे कि जीभ हमेशा स्वादिष्ट भोजन कि तरफ मन को भगाती है तथा मन को उसी तरफ प्रेरित करती है.   अब मन को सलाह देने के लिए बुद्धि और अहंकार दोनों होते है.  अहंकार ज्ञानेन्द्रियो के साथ मिलकर मन को , राग, भोग,  विलास कि तरफ  ले जाता है.  मगर  भोग से जो सुख मिलता है वो अस्थायी होता है त्तथा उसके खो  जाने का डर हमेशा जीव को दुखी रखता है.  उसके खो जाने के  बाद तो वो और भी दुःखदायी हो जाता है.  येही भोग के सुखो को हमेशा बनाये  रखने कि कामना मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारो को जन्म देती है.  इन विकारो के अधीन हुआ मनुष्य अच्छे- बुरे कर्मो के बंधन में फंसता चला जाता है.

            जब मनुष्य बुद्धि कि सलाह से चलता है तो अपने हर कार्य को परमात्मा का कार्य और उसकी मर्जी समझकर करता है और उसमे कोई फल कि कामना नही छुपी होती इसलिए कोई स्वार्थ नही होता इसीलिये वो कर्म निष्काम कर्म कहलाता है और उसका कोई अच्छा या बुरा फल नही होता.  ऐसा मनुष्य जो बुद्धि से मन को चलाता है वो  ही ज्ञानी कहलाता है.  बुद्धि के बाद आत्मा यानि परमात्मा का स्थान है.    उस आत्मा से सम्पर्क करने के लिए अपनी इन्द्रियों को बाहर के सुखो कि तरफ भागने से रोककर अंदर कि तरफ मोड़ना होता है ताकि वो अपने अंदर छुपे अन्नंत आंनंद को महसूस कर सके और उसको पा सके.  ऐसा करना ही ज्ञान है.   उस आंनंद को महसूस करने  के बाद उसको आगे बड़ाने के लिए  अभ्यास कि आवयश्कता होती  है तथा अभ्यास ज्ञान को बढ़ाता है और ज्ञान अभ्यास को बढ़ाता है और दोनों निरंतर एक दूसरे के सहाई होते है.       

आइये इसे और समझने के लिए सृष्टि कि रचना को जाने.  ये सम्पूर्ण सृष्टि पुरुष  और प्रकृति के मिलने से बनी है.  पुरुष से यहाँ मतलब है परमात्मा (शिव) और प्रकृति से मतलब है उसकी शक्ति.  यह दोनों ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण है.  इसमें पुरुष जो कि हर जीव के अंदर मौजूद है उसमे परिवर्तन नही होता जबकि प्रकृति हमेशा परिवर्तन शील होती है तथा पुरुष अपनी शक्ति-प्रकृति के जरिये ही सृष्टि चलाता है.  जब जीव खुद को पुरुष का अंश समझ कर हर घटना को प्रकृति का खेल समझता है तथा किसी घटना से दुखी या सुखी नही होता तब वो ज्ञानी कहलाता है.  यह पूरी प्रकृति तीन गुणों  पर आधारित है, वो है सात्विक, राजसी और तामसिक  गुण.  समस्त सृष्टि के प्राणियों का आचार व्यव्हार उनमे इन तीनो गुणों के अनुपात पर निर्भर करता है.      

इसको और समझने के लिए हम "मै कौन हूँ" इस प्रश्न का उत्तर जानने कि कोशिश करते है.  इस प्रश्न में "मै" प्रकृति है क्योंकि यह हर दम बदलता रहता है जैसे कि मै किसीका बेटा/बेटी हूँ, मै किसी का बाप हूँ, मै आदमी हूँ, मै औरत हूँ इत्यादि.  "हूँ" में "है" है जो कि पुरुष(परमात्मा) है और कभी नही बदलता.  यह "है" जब विकार यानि हूंकार से घिर जाता है तो "हूँ" में बदल जाता है.  इसलिए खुद को जानने के लिए उस "है" को जानना और मानना चहिये जो सदा रहता है.  सात्विक लोग इस अहंकार रुपी हुंकार को मिटा देते है और खुद को "है" का अंश समझते है और असली सुख कि तरफ जाते है.  राजसी गुणों कि अधिकता वाले मनुष्य विषय भोग कि तरफ भागते है और और उन भोगो को बनाये रखने तथा उनके खो जाने के डर से दुखी रहते है.  मगर यही लोग समाज कि भौतिक उन्नति के लिए कार्य करते है.  उनकी कामनाए उन्हें निरंन्तर कर्म करने के लिए प्रेरित करती है.    मगर तामसिक अधिकता वाले लोग आलसी और प्रमादी होते है जो कि समाज को नुक्सान पहुंचा सकते है.  मगर इन तीनो कि तरह के गुणों में कर्म बंधन तो रहता ही है.  चाहे  सात्विक लोग अपने कर्म भगवान को पाने के लिए करते है मगर उसमे भी कामना तो होती है.  इसलिए सबसे उत्तम तो ये है कि अपने आप को परमात्मा को अर्पण कर दो और अपने सभी आने वाले कर्म परमात्मा को अर्पित कर दो तभी इस कर्म बंधन से छुटकारा मिलेगा.

मगर इसमें भी ध्यान  रहे कि पहले किये हुए कर्मो का फल तो भुगतना ही पड़ेगा.  इसके इलावा यह बात सही नही है कि  अच्छे कर्म बुरे कर्मो को काटते है.  असलियत में दोनों का खाता अलग अलग चलता है.  मगर इतना जरूर होता है कि जब बुरे कर्मो कि वजह से प्रतिकूल परिस्थिति बनती है तब अच्छे कर्म आकर सहारा देते है और मनुष्य ऐसी परिस्थिति में भी सयंम बनाये रखता है और आगे के लिए कोई बुरा कर्म नही करता.  जैसा कि "महा भारत " में प्रसंग आता है कि जब भीष्म पितामह कुरुशेत्र के मैदान में युद्ध में घायल हुए बाणों कि शैय्या पर पड़े थे तब उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से पूछा   कि हे भगवन पिछले सौ जन्मो कि मुझे याद है कि मैंने ऐसा कोई पाप नही किया फिर मै इस बाणों कि शैय्या क्यों पड़ा हूँ.  तब भगवान श्री कृष्ण ने उनके माथे पर हाथ रखकर उन्हें १०१ वे जन्म कि याद दिलाई जिसमे वो एक बार जंगल में जा रहे थे तो उनके रास्ते में एक सांप आ गया और उन्होंने उसे तीर से उठाकर झाड़ी में फैंक दिया और वो सांप वहां काँटों में उलझा तड़पता रहा.  तो इस तरह कर्म  जीव को तभी छोड़ते है जब वो उन्हें भोग लेता है.

आइये अब हम मानव के कर्मफल कि तरफ चलते है.  कभी कभी क्रियमण कर्म तुरंत फल देकर खत्म हो जाते है और कभी क्रियमण कर्मो का एक भाग संचित कर्मो में चला जाता है और एक भाग संस्कार में जमा हो जाता है.  प्रारब्ध वो कर्म है जो फल देने को तत्पर हो जाते है.  इन संस्कार में जमा हुए कर्मो में से जो फल के लिए तत्पर होते है उनसे जीव का स्वभाव या संस्कार बनते है बाकी के प्रारब्ध कर्मो से जीव को जन्म का परिवार और वातावरण मिलता है तथा बाकि प्रारब्ध कर्मो से उसको हर क्षण विभिन्न परिस्थितयो का सामना करना पड़ता है.  हमारे सम्बन्धी और रिश्तेदार भी हमे प्रारब्ध कर्मो के अनुसार मिलते है और उनका हमारे प्रति व्यवहार भी इसी अनुसार होता है जैसे कि कई बार निकट सम्बन्धी ही मनुष्य को नुक्सान का कारण बन जाते है.   ये सब पिछले कर्मो का ही लेना-देना होता है कि कोई किसी कि मदद करता है या नुक्सान करता है.  स्वभाव और परिस्थितया बेशक संचित कर्मो से मिलती है मगर उन हालात में मनुष्य कर्म करने को पूर्णयता स्वतंत्र होता है और वो अच्छे या बुरे कर्म कर सकता है तथा अपने स्वभाव को कुछ  हद तक बदल सकता है.  और इस तरह कर्मो कि कड़ी जारी रहती है.  तांत्रिक भी किसी पर जब तांत्रिक क्रिया करते है तो वो उसके निष्क्रिय पड़े अच्छे या बुरे संचित कर्मो में से कर्मो को सक्रिय करके  प्रारब्ध कर्म बनाकर ही उसका अच्छा या बुरा करते है.   हाँ इन्सान के अच्छे कर्म उसके बुरे कर्मो से छुटकारा तो नही दिला सकते मगर कई बार उसके दुष्प्रभाव को कम कर देते है जैसे कि किसी अपराधी का अच्छा चाल चलन देखकर उसकी सजा कम हो जाती है. 

               तो निष्कर्ष यही निकलता है कि कर्म करना तो मानव का प्रथम कर्तव्य है और कर्मो का भोग तो भोगना ही पड़ता है मगर अगर कर्मबंधन से पाना है छुटकारा तो खुद के सभी कर्म परमात्मा  को पूरी तरह समर्पित कर दे और कोई भी कर्म किसी कामना के लिए मत करे.

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